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Monday, November 1, 2010

हम भी है रेस में !

Posted by rachit kathil

आदर्श सोसायटी फ्लैट घोटाले में फंसे सीएम अशोक चव्हाण की दिल्ली दरबार में पेशी औऱ आलाकमान को सौंपे इस्तीफे के बाद सीएम पद की उम्मीदवारी के लिए दौड़ तेज हो गई है....और इसका नजारा भी दिखाई दिया शक्ति स्थल पर....जहां चव्हाण के इस्तीफे के बाद..स्व. इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि जुटे नेताओं ने सब को बता दिया कि हम भी रेस में शामिल है... जी हां... हम बात कर रहे हैं... उन नेताओं की जिनके नाम महाराष्ट्र के नए सीएम लिए के लिए सामने आ रहे हैं....इनमें केन्द्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे , पूर्व सीएम विलास राव देशमुख, केन्द्रीय मंत्री पृथ्वी राज चौहान,मुकुल वासनिक और विवादो में फंसे महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री नारायण राणे का नाम सामने आ रहा है... लेकिन इंदिरा जी को श्रद्धांजली देने के मौके पर पहुंचे इन नेताओं के बीच इस बात की होड़ साफ दिखाई दी कि कौन 10 जनपथ के ज्यादा करीब है...... इन नेताओं में सबसे पहला नाम सुशील कुमार शिंदे का है.. सुशील कुमार शिंदे पहले भी महाराष्ट्र की कमान संभाल चुके हैं...और इस समय केन्द्र में ऊर्जा मंत्री के पद पर हैं.... दूसरा नाम पूर्व सीएम विलासराव देशमुख का है... जो कि दो बार सूबे के सीएम की कुर्सी संभाल चुके हैं...और मौजूदा समय में केंद्र में मंत्री हैं... वहीं अब तीसरे दौर की भी दावेदारी कर रहे हैं.... पृथ्वीराज चौहान.. जो कि इस समय सोनिया ओर मनमोहन के काफी करीबी हैं...लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति पर उनकी पकड़ जरा ढीली ही है।.. वहीं चौथा नाम हाल ही में विवादों में आए नारायण राणे का है..लेकिन इनके ऊपर भी एक नये घोटाले की छाया पड़ गई...वहीं एक और नाम चर्चाओँ में है मुकुल वासनिक का महाराष्ट्र कांग्रेस प्रभारी और गांधी परिवार से नजदीकी रखने वाले मुकुल कांग्रेस में युवा नेता के तौर पर भी गिने जाते हैं....लेकिन फिलहाल तो अशोक को मोहलत मिली हुई है...और अब दिवाली के बाद ही साफ हो पाएगा...कि महाराष्ट्र का ये ताज..अशोक के सिर पर ही रहता है या कोई और ही ये सेहरा बांधता है

लालू के साथ चर्चा और विवादों का साथ नया नहीं.....बिहार में चौथे दौर के मतदान में भी कुछ ऐसा ही हुआ......इस दौर में पटना के दीघा स्थित बूथ नंबर 119 पर दो वीवीआईपी नेताओं ने अपना वोट दिया...लेकिन वोट डालने के साथ ही शुरू हो गया विवादों का सिलसिला.......दरअसल राबड़ी देवी और लालू प्रसाद जब वोट डालने बूथ में घुसे तो उनके साथ उनके सुरक्षाकर्मी भी बूथ में अंदर घुस गए........जबकि नियामानुसार वोटर के साथ कोई सुरक्षाकर्मी 100 मीटर के दायरे में नहीं जाता है.....इस तरह दोनों नेताओं ने आचारसंहिता का उल्लंघन किया और इस बाबत मामला दर्ज हो चुका है.....और तो और मामले के जांच के आदेश भी दे दिए गए हैं......सबसे बड़ी बात कि आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद खुद सीएम भी रह चुके हैं और रेल मंत्री भी...ऐसे में उन्हें इस बात की जानकारी तो होनी ही चाहिए थी कि बूथ के अंदर सुरक्षाकर्मियों को ले जाने की मनाही होती है.....इस बारे में पूछे जाने पर वरिष्ठ बीजेपी नेता और उप मुख्यमंत्री ने कहा कि लालू प्रसाद को कानून तोड़ने की पुरानी आदत है.....उन्होंने ये भी कहा कि लालू पर एक और मामला कोई बड़ी बात नहीं है....अब देखना ये है कि इस नए मामले में जांच के बाद चुनाव आयोग किस तरह का कदम उठाता है...........

Tuesday, March 16, 2010

माया तेरी अजब कहानी

Posted by rachit kathil

आखिर करे तो करे क्या ? या फिर जो चल रहा है उसे चलने दे या फिर उसका डटकर सामना करे ये सोचना उत्तर प्रदेश की जनता को बहुत जरुरी है क्योंकि उत्तर प्रदेश की मुखिया और बसपा सुप्रीमो मायावती जिस तरिके से पैसा खर्च कर रही ही , उस से नही लगता की उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बन पायेगा बसपा सुप्रीमो को तो सिर्फ इस समय अपनी पार्टी ही दिखाए दे रही है जिस तरीके से उन्होने अपनी पार्टी की २५ वी सिल्वर जुबली बनायीं उससे लगता है कि उत्तर प्रदेश की गरीब जनता को एक बार फिर खून के असू रोने पड़ सकते है मायावती ये भूल रही है कि जिस प्रदेश की वे मुखिया है उस प्रदेश की जनता भोली नहीं है वे इस सिल्वर जुबली में ये तक भूल गयी कि उनके प्रदेश का एक हिसा अज भी भुकमरी से ग्रस्त है जी हां मै उसी बुंदेलखंड कि बात कर रहा हु जहा अज से ४ साल पहिले सुखा आया था लकिन मायावती को उसकी तनिक भी चिनता नहीं है उन्हें तो सिर्फ अपने निर्वाचन स्थान और आपनी पार्टी के आलावा कुछ भी नहीं दिखाई देता है मायावती ने जिस तरीके करोड़ करोडो रूपए इस रैली खर्च किये लेकिन यदि उस गरीब जनता से पूछे कि इस रैली आखिर नुकसान किस का हुआ तो वह यही कहती है कि वक्त बताएगा ये बात मायावती और उनकी पार्टी को सोचना बहुत जरुरी है नहीं तो आगामी चुनाव मै कुछ भी हो सकता है

Posted by rachit kathil

आखिर करे तो करे क्या ? या फिर जो चल रहा है उसे चलने दे या फिर उसका डटकर सामना करे ये सोचना उत्तर प्रदेश की जनता को बहुत जरुरी है क्योंकि उत्तर प्रदेश की मुखिया और बसपा सुप्रीमो मायावती जिस तरिके से पैसा खर्च कर रही ही , उस से नही लगता की उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बन पायेगा बसपा सुप्रीमो को तो सिर्फ इस समय अपनी पार्टी ही दिखाए दे रही है जिस तरीके से उन्होने अपनी पार्टी की २५ वी सिल्वर जुबली बनायीं उससे लगता है कि उत्तर प्रदेश की गरीब जनता को एक बार फिर खून के असू रोने पड़ सकते है मायावती ये भूल रही है कि जिस प्रदेश की वे मुखिया है उस प्रदेश की जनता भोली नहीं है वे इस सिल्वर जुबली में ये तक भूल गयी कि उनके प्रदेश का एक हिसा अज भी भुकमरी से ग्रस्त है जी हां मै उसी बुंदेलखंड कि बात कर रहा हु जहा अज से ४ साल पहिले सुखा आया था लकिन मायावती को उसकी तनिक भी चिनता नहीं है उन्हें तो सिर्फ अपने निर्वाचन स्थान और आपनी पार्टी के आलावा कुछ भी नहीं दिखाई देता है मायावती ने जिस तरीके करोड़ करोडो रूपए इस रैली खर्च किये लेकिन यदि उस गरीब जनता से पूछे कि इस रैली आखिर नुकसान किस का हुआ तो वह यही कहती है कि वक्त बताएगा ये बात मायावती और उनकी पार्टी को सोचना बहुत जरुरी है नहीं तो आगामी चुनाव मै कुछ भी हो सकता है

Thursday, September 24, 2009

कार्यकर्त्ता की आवाज

Posted by rachit kathil

क्या पार्टी अपने बलबूते पर चुनाव जीतती है या फिर पार्टी के किसी बड़े नेता की छवि को दिखाकर चुनाव जीता जाता है यह बात उतनी ही गलत है जितना अपने आप को परिपक्व बताना क्योकि बना कार्यकर्त्ता के कोई भी चुनाव नहीं जीता जासकता उन्ही कार्यकर्ताओ की भावनाओ से खेलना सभी पार्टी की आदत सी बनगए है पहले तो पार्टी उन्हें चुनाव लड़ने के लिये तेयार करती है और फिर यदि उस सीट पर किसी बड़े नेता जी के पुत्र व् पुत्री या किसी रिश्तेदार का दिल आ जाये तो क्या कहना ? क्योकि पार्टियों के अन्दर कार्यकर्ताओ की जरा भी कद्र नहीं है ये तो पार्टी की निति ही है की जब मन में आया तो किसी भी कार्यकर्त्ता को कुछ समय के लिए खुश कर दिया और फिर अपना कम निकालकर उसके अरमानो के तोड़ दिया यह कहा का इंसाफ है ? जिस तरह हल ही में देश की सबसे बड़ी पार्टी ने कहा था कि उनकी पार्टी में सबसे पहले कार्यकर्ताओ को आगामी चुनाव में टिकिट देगी लेकिन ये सारी बाते टिकिट के एलान के पहिले ही धराशाही हो गई अर्थात जिन कार्यकर्ताओ को टिकिट मिलने कि उमीद थी उनकी उमीदो पर भी पानी फिर गया क्योकि उनकी सीट पर बड़े बड़े नेताओ के बेटे व् बेटी उपर से ही चुनाव मदन में उतर्दी जाती है एसा ही हर पार्टी में हो रहा है ये सोचना भुत जरुरी है कि कार्यकर्ताओ के साथ जो हो रहा है वह सही है या गलत ?

Tuesday, July 28, 2009
Posted by rachit kathil

जब मैं छोटा था,शायद दुनिया बहुत बड़ी हुआ करती थी...मुझे याद है मेरे घर से "स्कूल" तक का वो रास्ता,क्या क्या नहीं था वहां,छत के ठेले, जलेबी की दुकान, बर्फ के गोले, सब कुछ,अब वहां "मोबाइल शॉप", "विडियो पार्लर" हैं, फिर भी सब सूना है....शायद अब दुनिया सिमट रही है......जब मैं छोटा था,शायद शामे बहुत लम्बी हुआ करती थी....मैं हाथ में पतंग की डोर पकडे, घंटो उडा करता था,वो लम्बी "साइकिल रेस", वो बचपन के खेल,वो हर शाम थक के चूर हो जाना,अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है और सीधे रात हो जाती है..........शायद वक्त सिमट रहा है........जब मैं छोटा था,शायद दोस्ती बहुत गहरी हुआ करती थी,दिन भर वो हुज़ोम बनाकर खेलना,वो दोस्तों के घर का खाना, वो लड़किया, वो साथ रोना,अब भी मेरे कई दोस्त हैं, पर दोस्ती जाने कहाँ है,जब भी "ट्रेफिक सिग्नल" पे मिलते हैं "हाई" करते हैं,और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं......

Posted by rachit kathil

शीशे का दी ,आये थे लेकर पत्थरों के शहर मैं गैरों से बचाते रहे ,टूटा अपनों की ठोकर मैं ...............मुद्दतों से प्याशे थे क्या बताये अब अपना हाल फर्क न कर सके यारों हम "आव और जहर" मैं ..............उसने साहिल पर ही डुबोया मेरा आके तो सफीना जिसके हवाले खुद ही किया था हमने तूफां की लहर मैं गम नहीं रुसवाई का हमको इस भरी महफ़िल मैं अब तो उसने ही गिराया नजर से जिसको बसाया हमने नजर मैं .........उम्र भर तुम याद हमको अब तो आया करोगे जरूर ताड्पेगे हम जख्मों से जब जो दिए तुमने जिगर